यूक्रेन बनाम फिलीस्तीन: युद्ध की दो रणनीति और अमेरिकन ड्रीम्स

संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में ट्रम्प का भाषण अमेरिकन ड्रीम्स के जमीन पर उतर आने की आहट को दिखा रहा है। ट्रम्प को तकलीफ है यूरोपीय देश उसकी चाहतों के साथ काम नहीं कर रहे हैं। अमेरीका दुश्मन गढ़ रहा है जिसमें एक ओर भारत, चीन और रूस हैं। उसे चिंता है कि नाटो अमेरिकी रणनीति के साथ नहीं चल रहा है। ट्रम्प भारत को रूस और चीन की धुरी में घसीट कर इसलिए लिए जा रहे हैं क्योंकि भारत रूस के तेल को खरीदकर यूरोप में बेच रहा है।

इस खरीद और बिक्री से रूस को आर्थिक मदद मिल रही है। इसी आर्थिक तंत्र से रूस यूक्रेन पर लगातार कब्जा बनाता जा रहा है। ट्रम्प का मानना है कि इस खेल में चीन भी शामिल है। इससे निपटने के लिए इसी आम सभा में वह टैरिफ को एक हथियार की तरह प्रयोग करने की बात कर रहे थे। हालांकि चीन के मामले में वह पीछे हट गये जबकि भारत के मामले में वह आगे बढ़ते जा रहे हैं।

यूक्रेन को लेकर जो चिंता अमेरीका को सता रही है, वह फिलिस्तीन के मामले में गायब है। इजरायल फिलिस्तीन के गाजा में जिस तरह के भयावह नरसंहार को अंजाम दे रहा है और खुलेआम फिलिस्तीन के अस्तित्व को ही खत्म कर देने की बात कर रहा है, उससे डोनाल्ड ट्रंप को कोई दिक्कत नहीं है। वह संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में यूरोपीय देशों को यूक्रेन के संदर्भ में ललकार रहे हैं कि आप तो यहां काफी करीब में खड़े हो, आप को तो बस आगे बढ़कर उन्हें रोक देना है।

ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने ‘‘मात्र इन सात महीनों न खत्म होने वाले सात युद्धों का अंत किया।’’ इस दावे में उन्होंने भारत-पाकिस्तान का नाम लिया और साथ ही इजरायल और ईरान का नाम लिया। लेकिन, उन्होंने इजरायल द्वारा फिलीस्तीन पर ढाये जा रहे युद्ध का एक बार भी नाम नहीं लिया जहां अब नाजी बर्बरता चरम पर है। ट्रम्प साफ शब्दों में यूरोप द्वारा रूस से तेल की खरीददारी पर प्रतिबंध लगाने की अपील कर रहे थे और ऐसा न करने पर टैरिफ की नीति को जोरदार तरीके से लागू करने की धमकी भी दे रहे थे।

टैरिफ साम्राज्यवाद की अहम रणनीति रही है। औपनिवेशिक दौर में यह सिर्फ अतिरिक्त मूल्य की वसूली का ही नहीं, खुली लूट का अहम हिस्सा रहा है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद के दौर में यह आर्थिक नीति की आधार भूमि बन गया। पूंजीवाद के उद्भव के साथ टैरिफ की विश्व स्तर पर कोई भी सामान्य रणनीति नहीं रही है। और, जब भी इसे बनाया गया वह साम्राज्यवादी हितों में जल्द ही बिखर गया। खासकर, युद्ध की स्थितियों में इसके टिके रहने की कोई संभावना नहीं रहती है।

पूंजी का अधिकांश हिस्सा बड़े साम्राज्यवादी देशों के पास होता है, ऐसे में उनके हितों के सामने अन्य देशों का हिस्सा काफी कम होता है। रूस और चीन ने टैरिफ के इसी खेल में घरेलू पूंजी संचयन को बढ़ाते हुए उसे पूंजी के विश्व बाजार में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार की तरह उतार दिया है। निश्चित ही भारत इस पूंजी संचयन और पूंजी निर्माण में काफी पीछे छूट गया है।

ट्रम्प के टैरिफ के इस खेल में अमेरिकन ड्रीम्स एक अहम भूमिका निभा रहा है। ट्रम्प अमेरिकी हितों की बात कर रहे हैं। उसका अमेरिकन हितों के पक्ष में खड़ा होना, टैरिफ पर कड़ा रुख अपनाना और युद्ध में हस्तक्षेप, कथित तौर पर मानवीय हस्तक्षेप अमेरिका के एक हिस्से को लुभा रहा है। वह हिस्सा कोई और नहीं यह अंधराष्ट्रवादियों की बढ़ती हुई खेप है जिसे अमेरिकी पूंजीवाद ने एक समय में किनारे फेंक दिया था। ये अब अमेरिकी पूंजीपतियों की संरक्षित सेना में बदल रहे हैं जो पिछले चुनाव में वहां की संसद तक में तोड़फोड़ करते घुस गये थे। अब अमेरिकी पूंजीपति पर्दे के पीछे नहीं हैं, वे सामने हैं और आर्थिक नीतियों पर अपने हितों को लेकर साफ-साफ बोल रहे हैं।

दुनिया के नक्शे पर रूस की उपस्थिति की घोषणा पर अंतिम मुहर अब डोनाल्ड ट्रंप लगा चुके हैं। अब यह दुनिया एक बार फिर से दो ध्रुवीय हो रही है। एक यूक्रेन को तबाह करता हुआ उस पर कब्जा कर रहा है और दूसरा फिलिस्तीन को नाजी बर्बरता के साथ खत्म कर रहा है। अमेरिका यूरोप को कैस्पियन सागर पार कर जाने के लिए ललकार रहा है। वहीं दूसरी ओर वह अब अफगानिस्तान और बांग्लादेश में अपने एयरबेस को ठोस बनाने की ओर बढ़ रहा है। अमेरिका के लिए मध्य एशिया में अफगानिस्तान की सीमा ही अंतिम सीमा थी। ऐसा लगता है कि अब वह इस सीमा से आगे बढ़ने की रणनीति की ओर बढ़ रहा है।

भारत की विदेश नीति में यूक्रेन और फिलिस्तीन कहां हैं, इसे खोजने के लिए आपको काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। यही स्थिति इजरायल और ईरान को लेकर रही है। चीन को लेकर भारत की रणनीति क्या है, यह भी साफ नहीं है। भारत की घरेलू आर्थिक नीति में न तो कोई निरन्तरता दिखती है और न ही घरेलू बचत को लेकर कोई रणनीति। जीएसटी पर चित भी मेरी, पट भी मेरी जैसा हास्यास्पद खेल लाभ से मनोरंजक अधिक दिखता है।

मजदूरों पर काम के घंटे का बोझ बढ़ता जा रहा है लेकिन वास्तविक मजदूरी घटती हुई दिख रही है। युवाओं में रोजगार को लेकर गहरी हताशा जन्म ले रही है। भारत अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के नाम पर देश के भीतर ‘घुसपैठिये’ की राजनीति कर रहा है। एक देश के तौर पर इस दुनिया के नक्शे पर भारत क्या कर रहा है, हम किस दिशा में जा रहे हैं, …खासकर तब जब दुनिया के नक्शे पर दो देशों को खत्म कर देने की रणनीति अपनाई जा रही है।

(अंजनी कुमार लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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